Friday, 1 April 2022

रसना च मम मन: विचार

वृक्षस्य पान नास्ति लभ्येत सन १९९० शरबत वस्तूये तत वर्षेण मुखपृष्ठया चित्रे। क्वचित् द्वि पत्रये स्थानीय चित्ते विषाद निश्पन्नित क्रियते। अपि समय च विस्मय नास्ति मामका मनये असमयी क्षेत्रे।
यदा कदा पिरुझ मस्तिष्कस्य logo विनिमय वार्ता दिल्हि स्थित दूरभाष यन्त्रे मम क्रियात्, तत् पश्चात् मम कार्यालय गतिकार्य स्थगित क्रियायाम च उद्भवामि रसना संस्थाने च जीवन क्षेत्रे।
ततपश्चात उचित च जरूरी अर्थिकोपार्जन क्रिया क्षुब्ध्य। असमयजगत मुुद्रायै अगोचर क्रियात, अहम, अगम निगम च आध्यात्मिक स्पंदन अनुभवामी, मामका शरीर च मम मन: मगज: च मस्तिष्कम क्षेत्र सिमा अंकने।
जयतु भारतम 

आशा सह:
जय गुरुदेव दत्तात्रेय
जय हिंद
जिगरम आलुभाण


Why company need to change its logo at several time... it is most biggest question for such those people, who are really thinking on spiritual BASED power ...


Monday, 21 March 2022

તિબ્બત્તી શબ્દ બારદો અને ગુજરાતી બારદાન

...  તિબેટના બૌદ્ધ ભિક્ષુકોની આધ્યાત્મિક સમજણ અતિગહન અને મહદંશે રહસ્યમય હોય છે એવું લોકો માને છે પણ અશ્વત્થામા ને ભૂલી જાય છે.... કે જેને ચિરંજીવ કહેલ છે.. ઇજિપ્ત વાળા એમનેમ સૂર્ય ને છોડી ઓરાયન ને નહિ જ ભણ્યા હોય... મમી ફિલ્મ ના ત્રણ ભાગ ઘણુ કહે જ છે...

સનાતન વૈદિક ધર્મમાં કુંડલિની જાગરણની સાધના દ્વારા આજ્ઞાચક્રને જાગ્રત કરવાની પ્રક્રિયા દર્શવવામાં આવી છે. પણ એ દર્શન શાસ્ત્ર થોડું ગહન છે...કે જેમાં હોરા અને ચેતના ની જ માત્ર વાત હોય.. અહીં વૈજ્ઞાનિક અભિગમ થકી  પરંતુ બૌદ્ધ ભિક્ષુઓ તો પોતાના કપાળમાં અણીદાર સાધન વડે છિદ્ર કરીને આજ્ઞાચક્રને વીંધવાની રીત અપનાવે છે.

માનવું ખોટું જ છે કે આથી ભગવાન શિવની જેમ ત્રીજું નેત્ર ખોલી શકાય છે. પણ તમારી આંતરિક ચેતના તમે બીજા ને આપો છો અથવા તમારું આધિપત્ય તમે બીજાને દોરવણી માટે કે જે હમેશા સાચું અને સારું કરે છે તેને આપો છો.. કેમકે એક વાત છે કે ઓરાને તમે મનુષ્ય દેહ સ્વરૂપ નથી જોઈ શકતા કે જ્યારે અણીમાં, લધિમા ની વિશિષ્ટ વાત હોય.. તમારો કોઈ મન: વિચાર જો ચેતના સાથે તમે જોડો તો એ તમારા શતાવધાન માં મદદ કરી શકે છે...

... તિબેટમાં જ્યારે કોઈ માણસ મૃત્યુશૈયા પર હોય અને  મરણ પામવાની પ્રક્રિયા ચાલુ જ હોય ત્યારે બૌદ્ધ ભિક્ષુઓ એની પાસે આવે છે અને એના કાનમાં મોટેથી ઉચ્ચારે છે, "તારું સૂક્ષ્મ શરીર હવે તારાં સ્થૂળ શરીરથી અલગ થઈ રહ્યું છે. હવે તું આ દેહ છોડીને બીજા દેહમાં જઈશ. અત્યારે તું જે સંકલ્પ કરીશ એ પ્રકારનો નવો દેહ તને પ્રાપ્ત થશે." આ ક્રિયાને તેઓ 'બારદો' કહે છે. (રેફેરન્સ શરદ ઠાકર ના fb પેજ પરથી)

..આધુનિક વિજ્ઞાને શોધ્યું છે કે કોઈ પણ માણસ મૃત્યુ પામે છે ત્યારે તેની એક પછી એક ઇન્દ્રિય નિર્જીવ થતી જાય છે અને શ્રવણેન્દ્રિય એટલે કે સાંભળવાની શક્તિ સૌથી છેલ્લે જાય છે. વિજ્ઞાન કહે છે કે મૃત્યુ પામ્યાં પછી પણ માણસ લગભગ ૨૩ મિનિટ સુધી સાંભળી શકે છે. શાસ્ત્ર તો 13 દિવસ સુધી તેની ચેતના સમેત રહે છે એવું કહે છે... જુઓ યજુર્વેદ...

શબ્દ બારદો એ વિશિષ્ઠ મર્મ સાથે છે...
• બાર અને બાર ચોવીસ તે ગુરુ દત્તાત્રેય ના ગુરુઓ છે પણ વિવિધ જાતિ પ્રજાતિ ના... સ્હેજ ગહન છે...
• બરદો યાની બર બીજો..
• વરદ ઓ યાની હવે તમે શ્રેષ્ઠ ... જેમાં બ નથી ન લઈ વ કહીયે તો... ભારત મા જ પૂર્વ પશ્ચિમ વિવિધ ક્ષેત્રના માં મૂળ અક્ષર અલગ રૂપે લેવાય છે.. ઉદાહરણ..સિંઘ અને હિંદ
• ગુજરાતી માં રૂઢિ પ્રયોગ છે પણ અહીં વાક્ય રૂપે..
અક્કલનો ઓથમીર એને કહે કે બુદ્ધિ નો બારદાન...
વધુ ઓછી સમઝ ને પ્રણવ રૂપી મન ની પ્રણામ...
જય ગુરુદેવ દત્તાત્રેય
જય હિંદ
જીગર ગૌરાંગભાઈ મહેતા
જૈગીષ્ય જીગરમ જીગર:
લૉ ગાર્ડન પાસે ના સમર્થના મંદિર માં શિવ મહીમન ના છેલ્લા બે લીટીના શબ્દો સમઝવા જેવા છે..




Wednesday, 2 December 2020

પિતૃ અને કુતરુ

Feel like Little cave saved by dog. Bboth are not natural but made by and made for human as artificial facilities for society's gorgeous peoples who want clean surface on earth...

નેત્રો, મિત્રો અને પિત્રો થોડોક જ ફેર છે મોં થી બોલતા શબ્દો ના માપદંડ ચકાસી લો.

નેત્ર, જે જુએ છે કદાચ સાચું ના પણ હોય તે જગ જાહેર વાત છે...

મિત્ર, ખૂબ દૂર હોય તો પાડોશી જ સ્નેહી તરીકે યોગ્ય મદદ કરી જ શકે...

પિતૃ, સદા માત્ર પ્રસંગો માના વૃદ્ધિ શ્રાદ્ધ અથવા નંદી શ્રાદ્ધ માજ નહિ પણ તમારા કાન માં અથવા આભાસ થકી તમારું જ નહિ પણ કોઈનું પણ સારું કરી શકે છે...

આંતરિક મહત્તમ ઊર્જા નું સ્થાન ઓષ્ઠ છે જ...

આફ્રિકન આદિવાસી પ્રથા નું ચિત્ર


यदा यदा ही धर्मस्य, ग्लानिर्भवति भारतः
     धर्मस्य तदात्मानाम सृजाम्यहम
परित्राणाय साधु नाम विनाशाय च दुष्कृताम
धर्म सँस्थार्पनाथाय संभावमि युगे युगे 

जय गुरुदेव दत्तात्रेय

जय हिंद

જીગર મહેતા / Jaigishya


अग्निपुराण एकाक्षर कोष महिमा

अग्निदेव कहते हैं- अब मैं तुम्हें 'एकाक्षराभिधान' तथा मातृकाओं के नाम एवं मंत्र बतलाता है। सुनो-'अ' नाम है भगवान्विष्णुका।"अनिषेध अर्थमें भी आता है। 

'आ' ब्रह्माजीका बोध कराता है। वाक्य-प्रयोगमें भी उसका उपयोग होता है। 'सीमा' अर्थ में 'आ' अव्ययपद है। क्रोध और पीड़ा अर्थमें भी उसका प्रयोग किया जाता है। 

'इ' काम-अर्थमें प्रयुक्त होता है। "रति और लक्ष्मोके अर्थ में आता है।

'उ' शिवका वाचक है।

"ऊ" रक्षक आदि अर्थों में प्रयुक्त होता है। 
"ऋ' शब्दका बोधक है। '"ऋ" अदितिके अर्थमें प्रयुक्त होता है।

 "ल+र+उ= लरू (तीन इकट्ठा लिखा नही जा रहा है।)
दोनों अक्षर दिति एवं कुमार कार्तिकेयके बोधक
हैं। 

'ए' का अर्थ है-देवी। 'ऐ' योगिनीका वाचक है।

'ओ' ब्रह्माजीका और 'औ' महादेवजीका
बोध करानेवाला है।

"अं" का प्रयोग काम अर्थमें होता है।

.. 'अः" प्रशस्त (श्रेष्ठ)-का वाचक है।

'क' ब्रह्मा आदिके अर्थमें आता है। 'कु' कुत्तिात
(निन्दित) अर्थमें प्रयुक्त होता है।

"खं''-यह पद शून्य, इन्द्रिय और मुखका वाचक है। 

'ग' अक्षर यदि पुलिंग ग में हो तो गन्धर्व, गणेश तथा गायकका वाचक होता है। नपुंसकलिङ्ग 'ग' गीत अर्थ में प्रयुक्त होता है। 

'घ' घण्टा तथा करधनीके अग्रभागके अर्थ में आता है। 'ताडन' अर्थमें भी "घ' आता है। 

"ङ" अक्षर विषय, स्पृहा तथा भैरवका वाचक है। 

S मतलब अव्यय संधि, निहारिका, संकलन से है।

'च' दुर्जन तथा निर्मल- अर्थमें प्रयुक्त होता है। 

"छ" का अर्थ छेदन है। उसका मतलब स्वच्छ भी है।

'जि' विजेयके अर्थमें आता है। 

'ज' पद गीतका बाचक है। मतलब किसका होना है ही है, तय है, पक्का वजूद से है।

'झ' का अर्थ प्रशस्त, "अं आधा 'का बल  ओर "ट" का गायन है। ट को सूक्ष्म सजीव पिंड से भी जोड़ा है।

ठ का शून्य, शिव तथा उदबन्धन है।'

ड अक्षर रुद्र ध्वनि या त्रास के अर्थ में आता है।

उसकी आवाजके अर्थ में 'ढ'का प्रयोग होता है। ढ को कहि पर आंख भी कहा है।

'ब' का  और निष्कर्ष एवं निभयके अर्थ में आता


'त का अर्थ है-तस्कर (चौर) और सूभरकी
पूँछ। त को समतल पर किसीका होना भी हो सकता है।


'च' भक्षणके और 'द' छेदन, धारण तथा
शोभनके अर्थ आता है। "

" पाता (धारण
करनेवाले या ब्रह्माजी) तथा पुस्तूर ( धतूरे)
अर्थमें प्रयुक्त होता है।

 'न' का अर्थ समूह और सुगत (बुद्ध) है। 

"प" उपवनका और 'यू:' शंशावातका बोधक है।

'फुकने तथा निष्पल होनेके अर्थ आता है। 

'बि' पक्षी तथा 'भ' वाराओंका बोधक है। 

"मा'का अर्थ है-लक्ष्मी, मान और माता ।

 'ब' बोग, याता (यात्री अथवा दवादिन) तथा 'रिण' नामक पक्षके अर्थमें आता

'र'का अर्थ है-अग्नि, बल और इन्द्र।

ल'का विधाता, "व" का विश्लेषण (बियोग या
बिलगाव) और, वरुण तथा "श' का अर्थ शायन
एवं सुख है।

"प" का अर्थ श्रेष्ठ, "स" का परीक्षा,
'सा' का लक्ष्मी, "स" का बाल, "ह" का धारण
तथा पद और 'क' का क्षेत्र, अक्षर, नृसिंह, हरि,
क्षेत्र तथा पालक । 

एकाक्षामन्त्र देवतारूप होता है। वह भोग और मोक्ष देनेवाला है। 

यह सब विद्याभोंको देनेवाला मन्त्र है। 

अकार आदि नौ अक्षर भी मन्त्र है, उन्हें उत्तम मातृका-मत्र  कहते हैं। 

इन मन्बौंको एक कमलके दलमें स्थापित करके इनकी पूजा करे। इनमें नौ दुर्गाओंकी भी पूजा की जाती है।

भगवती, कात्यायनी, कौशिकी, चण्डिका, प्रचण्डा ||
सुनाथिका, उपमा, पार्वती तथा दुर्गाका पूजन
करना चाहिये। 

"ॐ चण्डिकायै विहे भगवत्यै धीमहि तन्नो दुर्गा प्रचोदयात्'- 

यह दुर्गा-मन्त्र षडङ्ग आदिके क्रमसे पूजन करना उचित है।

अजिता, अपराजिता, जया, विजया, कात्यायनी, भद्रकाली, महला, सिदि, रेवती, सिद्ध आदि बटुक तथा एकपाद, भीमरूप, हेतुक, कापालिकका पूजन करे। मध्यभागमें नौ दिक्पालौकी पूजा करनी चाहिये। मन्त्रार्थको सिद्धि के लिये 'ह्रीं दुर्ग रक्षिणि स्वाहा'-इस मन्त्रका जप करे। 

गौरीकी पूजा करें; धर्म आदिका, स्कन्द आदिका तथा
शक्तियोंका बजन करे। प्रजा, जानक्रिया, वाचा,
कागीशी, ज्वालिनी वामा, ज्येष्ठा, रोहा, गौरी, ही
तथा पुरस्सरा देवीका'ही: सः महागौरि कविते
स्वाहा'-

इम ममंत्र  महागौरीका तथा जानाशक्ति, क्रियाशक्ति, सुभगा, ललिता, कामिनी, काममाला और इन्द्रादि शक्तियोंका पूजन भी एकाक्षर मन्त्रोंसे होता है। गणेश-पूजनके लिये गं स्वाहा' 'यह मूलमन्त्र है। अथवा-'गं गणपतये नमः ।' से भी उनकी पूजा होती है। 

रक्त, शुक्ल, दन्त, | नेत्र, परशु और मोदक-
यह "पाहा' कहा गया है। गन्धोल्काय नमः।" से क्रमशः गन्ध आदि निवेदन करे। गज, महागणपति तथा महोल्क भी पूजनके योग्य है। 'कूष्माण्डाय, एकदन्ताय, त्रिपुरान्तकाय, श्यामदनायिकटाहासाय, लम्बनासाननाय, पाप, मेघोल्काय, प्रमोस्काय, विकटॉकटाब, गजेन्द्रगमनाय, भुजगेन्द्रनाराय, शशाधराय, गणाधिपतये स्वाहा।'- 

मन्त्रोंक आदिमें 'क' आदि एकाक्षर बीज-मन्त्र लगाये और अन्त में 'नमः' एवं 'स्वाहा' शब्दका प्रयोग करे। 

फिर इन्हीं मन्त्रीद्वारा तिलोंसे होम आदि करके मन्नार्थभूत
देवताका पूजन करे। अथवा दिरेफ, हिर्मुख एवं पक्ष आदि पृथक्-पृथक् मन्त्र हो सकते हैं। अब कुमार कार्तिकेयजीने कात्यायनको जिसका उपदेश
किया था, वह व्याकरण बतलाऊँगा ॥११-२८ ॥


भूलचूक लेनिदेनि, हो तो माफी स्वीकार्य। सॉफ्टवेर से ट्रांसलेट किया है, इस लिये।

जय गुरुदेव दत्तात्रेय

जय हिंद

आजकी तारिख स्पेशल है

हिंदी गुजराती इकट्ठा कर तो

दो बारा बीस????







Sunday, 29 November 2020

खट्वांग

खट्वांग एक उचित शब्द समझ


(1) शिव के हाथ का एक आयुध। इसमें दंड के ऊपर पशु के खुर के बीच मानव कपाल लगा होता है। योगी और संन्यासी भी इस आयुध का उपयोग करते हैं। लोकजीवन में इसे जादू की लकड़ी कहा जाता है। daakini iron भी कहते है।

(2) सूर्यवंशी राजा विश्वसह का पुत्र। इसने देवदानव युद्ध के समय स्वर्ग जाकर देवताओं की बड़ी सहायता की थी। वायु पुराण में इस राजा की बड़ी महिमा गाई गई है।

(3) शिव ताण्डव में भी कुछ शब्द भेदी है जेसे की 

जटा ट्वी गलज्जल प्रवाह पावित स्थले

जब हम बाल को माथे से जड़ से उखाड़ते है तो उस जगह माथे पर एक रन्ध्र के साथ जो प्रवाही बाहिर आता है उस जगह छोटा एक दाना से बन जाता है।

4 खट्वांग योग नाम कही सुना था।

5 एक विधान शायद कुछ ऐसा 

अटव्यामस्य खटवांगी मुद्रा।

Tuesday, 18 August 2020

उव्वसग्गहरम पासम जैन स्तोत्र

उव्वसग्गहरम पासम स्तोत्र जैन भाषा मे है।

महदांश वह जैन तीर्थंकर पार्श्वनाथजी के लिये प्रेरित है।

जैन धर्म को कोंग्रेस ने सन 2013-14 में लघुमती में डाला उसके बाद पटेल के लिए माइनॉरिटी की मुहिम में हार्दिक को ओर साथी लोग को राष्ट्र द्रोह का मुकदमा सहन करना पड़ा। वह अलग बात है।

जैन धर्म मे हिंसा का प्रावधान नही है।

फिरभी पार्श्वनाथ की तीर्थंकरों में गिनती नाम रूपसे महत्वपूर्ण भूमिका में है।

संस्कृत में पार्श्व का मतलब होता है पिछेका/पीछेकी/पिछला वगेरा। मतलब वर्तमान को अपनी पीछे की कोई बात प्रश्न अगर करती हो तो उसका निवारण पार्श्वनाथ जी को प्रार्थना करके, मतलब तलवार का प्रहार सुई से टाल सकने की सामर्थ्यवान परम् महासत्ता को याचन करना है।

नाथ मतलब आरूढ़ होना या किसीके ऊपर अधिपत्य स्थापित करना। अगर स्त्री है तो उसके पति जैसा शब्दार्थ होता है।

जो सामर्थ्यवान परम सत्ता है, उसे अभ्यर्थना, की वह हमारे वर्त्तमान को परेशान न करते हुए सिर्फ पीछे की जोभी बुरी बात हो उसे लय प्रधान प्रकृति से स्वच्छ हमे रखे।

जय गुरुदेव दत्तात्रेय।

जय हिन्द।

जिगर महेता / जैगीष्य

Monday, 17 August 2020

અરિણી નિયમે દોણી

નિસરણી ગણી જેને લાકડાની, ક્ષેત્રના ધ્યેય પ્રાપ્ત કરવા, 
તે જ નિસરણી આડી પૃથ્વી પર ઠાઠડી કેમ ગણાય?
બે વાંસડા અને બાર ખપાટિયા, ક્રવ્યાદ અગ્નિ થી દુર,
પંચ મહાભૂત થી પરબ્રહ્મ પ્રાપ્તિ, સુધી યાત્રા માં પંકાય?
દરેક મનુષ્ય નિધન બાદ નનામી તરીકેનો જ  વિચાર્યો,
કુદરત તને પ્રશ્ન છે, શેરીના પશુ પક્ષી ગાયબ ક્યાં થાય?
માટી, છાણ, ઘી, અગ્નિથી બનતી દોણી ને ઘરની જ કહી
તો એકમાત્ર અગ્નિ ને ઓગણ પચાસ નામે કેમ કહેવાય?
પાવક, પવમાન, ગ્રહ્યપ્ત્ય, સ્વધા, સ્વાહા વિવિધે એકતા
પરમ ધિષ્ણી, બેંગ્લોર બાદ તું ક્યાં એ પણ કહી દેને?
બ્રહ્મ માં જો હોય આભડછેટ દરેક સ્થાને, મમ્મી ની વાતે,
હે ધિષ્ણી, તું કેટલી પાવિત, એ હું મમ્મીને પણ કહી શકું.

મિત્ર ઋષિક ભટ્ટ ને યાદ કરી લખેલ પદ
અરિણી નિયમે દોણી

જીગર મહેતા / Jaigishya